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India's 15 वर्षीय सुप्रीम कोर्ट सिविल रिफरेन्सर (Supreme Court Civil Referencer) - Edition 2025

Author : S.K. Jain
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15 वर्षीय सुप्रीम कोर्ट सिविल रिफरेन्सर (Supreme Court Civil Referencer) 2010–2024, लेखक एस.के. जैन, प्रकाशक इंडिया पब्लिशिंग कंपनी, इंदौर — उच्चतम न्यायालय के पन्द्रह वर्षों के सिविल निर्णयों का हिन्दी में विषयवार एवं अधिनियम-वार संकलन। इसमें सिविल प्रक्रिया संहिता, सम्पत्ति अन्तरण अधिनियम, विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, संविदा विधि, उत्तराधिकार एवं बँटवारा, किरायेदारी एवं बेदखली, परिसीमा एवं प्रतिकूल कब्जा, पंजीकरण एवं स्टाम्प, भूमि अर्जन, माध्यस्थम्, तथा सेवा एवं उपभोक्ता सम्बन्धी निर्णय सम्मिलित हैं। सजिल्द, संस्करण 2025।  
No of pages

1999

No of Pages
Language

Hindi

Language
Edition

Edition 2025

Edition
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Tags: Referencer, Supreme Court, Case Digest, Civil Law Digest

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15 वर्षीय सुप्रीम कोर्ट सिविल रिफरेन्सर (Supreme Court Civil Referencer), 2010–2024, लेखक एस.के. जैन, प्रकाशक इंडिया पब्लिशिंग कंपनी, इंदौर — उच्चतम न्यायालय के पन्द्रह वर्षों के सिविल निर्णयों का हिन्दी में संकलित एवं विषयवार रिफरेन्सर। संस्करण 2025, सजिल्द।

सिविल न्यायालय में बहस का निर्णायक क्षण प्रायः वह होता है जब किसी बिन्दु पर उच्चतम न्यायालय का सीधा निर्णय प्रस्तुत किया जाता है। कठिनाई यह है कि निर्णय अंग्रेज़ी में रिपोर्ट होते हैं, वर्षों में बिखरे रहते हैं, और उन्हें खोजने के लिए या तो उद्धरण याद होना चाहिए या महँगे डेटाबेस की सुविधा। यह रिफरेन्सर उसी अन्तर को भरता है — 2010 से 2024 तक के सिविल निर्णय, विषय एवं धारा के अनुसार क्रमबद्ध, सरल हिन्दी में।

पुस्तक की विशेषताएँ (Key Features)

  • 15 वर्षों (2010–2024) के उच्चतम न्यायालय के सिविल निर्णयों का संकलन
  • सम्पूर्ण सामग्री हिन्दी में
  • विषयवार एवं अधिनियम-वार क्रमबद्ध, शीघ्र सन्दर्भ हेतु
  • प्रत्येक बिन्दु पर निर्णय का सार एवं उद्धरण
  • संस्करण 2025 · सजिल्द (हार्डबाउंड)
  • प्रकाशक — इंडिया पब्लिशिंग कंपनी, इंदौर

विषय-वस्तु (Coverage)

सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908। वाद-पत्र एवं उसका अस्वीकरण, वाद-हेतुक, अधिकारिता, पक्षकारों का संयोजन, विवाद्यक विरचन, साक्ष्य, अस्थायी व्यादेश एवं आदेश 39, एकपक्षीय डिक्री एवं उसका अपास्त किया जाना, संशोधन (आदेश 6 नियम 17), पूर्वन्याय (res judicata), अपील, पुनरीक्षण, पुनर्विलोकन, तथा डिक्री का निष्पादन।

सम्पत्ति अन्तरण अधिनियम, 1882। विक्रय, बन्धक, पट्टा, दान एवं विनिमय; भागकालीन हस्तान्तरण (lis pendens); और सम्पत्ति के अन्तरण से जुड़े विवाद।

विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963। संविदा का विनिर्दिष्ट पालन एवं 2018 के संशोधन के पश्चात् की स्थिति, कब्जे की वसूली, घोषणात्मक अनुतोष, तथा स्थायी एवं अस्थायी व्यादेश।

संविदा विधि। संविदा का निर्माण एवं भंग, प्रतिकर, तथा क्षतिपूर्ति एवं प्रत्याभूति।

उत्तराधिकार, बँटवारा एवं पारिवारिक सम्पत्ति। हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम एवं पुत्री के सहदायिक अधिकार, वसीयत एवं उसका प्रमाणन, बँटवारा, तथा पैतृक एवं स्वअर्जित सम्पत्ति का भेद।

किरायेदारी एवं बेदखली। मकान मालिक-किरायेदार विवाद, सद्भावी आवश्यकता, किराया-चूक, तथा राज्य किराया नियंत्रण विधियाँ।

परिसीमा अधिनियम, 1963। वादों एवं अपीलों की परिसीमा, विलम्ब की माफी (धारा 5), तथा प्रतिकूल कब्जा।

पंजीकरण एवं स्टाम्प। दस्तावेज़ों का अनिवार्य पंजीकरण, अपंजीकृत दस्तावेज़ की ग्राह्यता, तथा स्टाम्प की कमी का प्रभाव।

भूमि अर्जन एवं राजस्व विधि। भूमि अर्जन, पुनर्वास एवं प्रतिकर सम्बन्धी निर्णय।

माध्यस्थम् एवं सुलह अधिनियम, 1996। माध्यस्थम् करार, पंचाट को चुनौती (धारा 34) एवं उसका निष्पादन।

सेवा, उपभोक्ता एवं अन्य सिविल विषय। सेवा सम्बन्धी विवाद, उपभोक्ता संरक्षण, मोटर दुर्घटना प्रतिकर, तथा अन्य विविध सिविल बिन्दु।

यह पुस्तक किनके लिए उपयोगी है? (Who Should Buy This Book?)

  • सिविल एवं राजस्व न्यायालयों में प्रैक्टिस करने वाले अधिवक्ता
  • हिन्दी माध्यम के जिला एवं तहसील न्यायालयों के वकील
  • न्यायिक अधिकारी एवं न्यायालय कर्मचारी
  • न्यायिक सेवा (RJS, MPCJ, UPPCS-J आदि) परीक्षाओं के अभ्यर्थी
  • विधि अधिकारी, सरकारी अभिकर्ता एवं पैनल अधिवक्ता
  • LL.B. एवं LL.M. के विद्यार्थी
  • बार एसोसिएशन, न्यायालय एवं संस्थागत पुस्तकालय

यह पुस्तक क्यों चुनें? (Why Choose This Book?)

पन्द्रह वर्ष का दायरा इस संकलन की सबसे बड़ी उपयोगिता है। किसी एक वर्ष का डाइजेस्ट तभी काम आता है जब निर्णय उसी वर्ष का हो; किन्तु व्यवहार में जिस बिन्दु पर प्राधिकार चाहिए वह किसी भी वर्ष का हो सकता है। 2010 से 2024 तक एक ही स्थान पर होने से खोज एक ही खण्ड में पूरी हो जाती है।

दूसरी उपयोगिता भाषा की है। जिला न्यायालयों में बहस एवं आदेश प्रायः हिन्दी में होते हैं, जबकि निर्णय अंग्रेज़ी में रिपोर्ट होते हैं। हिन्दी में सार दिया होने से अधिवक्ता को अनुवाद का अतिरिक्त श्रम नहीं करना पड़ता, और सन्दर्भ न्यायालय के समक्ष सीधे प्रस्तुत किया जा सकता है।

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